kinetic theory – NCERT | Solid , Liquid, Gas Explanation in Hindi

kinetic theory – NCERT | Solid , Liquid, Gas Explanation in Hindi

प्रश्न – द्रव्य के अणुगति सिद्धान्त ( kinetic theory ) के आधार पर ठोस, द्रव तथा गैस की व्याख्या कीजिए।

अणुगति सिद्धान्त ( kinetic theory ) के आधार पर ठोस की व्याख्या

kinetic theory
ठोस के अणु

अणुगति सिद्धान्त (kinetic theory) के आधार पर ठोस अवस्था के गुणों की व्याख्या निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती है

(i) आकार – ठोस अवस्था में अणुओं की स्थितियाँ एक निश्चित क्रम के अनुसार होती हैं । अणुओं के निश्चित स्थानों पर रहने के कारण ठोसों का आकार निश्चित रहता है।

(ii) आयतन – ठोस पर दाब डालने पर उसके आयतन में परिवर्तन नहीं होता,क्योंकि उसके अणु पास-पास स्थित होते हैं तथा उनकी स्थितियाँ निश्चित होती हैं; अतः ठोस का आयतन भी निश्चित होता है। गर्म करने पर इसके आयतन में उपेक्षणीय अन्तर आता है।

(iii) आकर्षण बल – अणु अत्यधिक पास-पास स्थित होते हैं जिससे अन्तरा-अणुक स्थान बहुत ही कम होते हैं इनमें पारस्परिक आकर्षण बल भी बहुत शक्तिशाली होता है ।

(iv) घनत्व – अणुओं के परस्पर अत्यधिक निकट होने के कारण ठोस का घनत्व अधिक होता है और यही कारण है कि ठोस कठोर और दृढ़ होते हैं ।

(v) गलन – “ठोस को गर्म करने पर उसके अणुओं का अपनी स्थिर स्थिति के इधर-उधर कम्पन बढ़ने लगता है। एक विशेष ताप पर पहुँचकर अणु इतने गतिशील हो जाते हैं कि उनका आपसी संसंजक बल उन्हें स्थिर स्थिति में नहीं रख पाता है। इसके फलस्वरूप अणु अलग-अलग होकर स्वतन्त्र घूमने लगते हैं; अतः ठोस, द्रव का रूप धारण कर लेता है। ठोस के पिघलकर द्रव बनने की इस क्रिया को गलन (melting) कहते हैं तथा जिस ताप पर ठोस पिघलकर द्रव बनता है उसे गलनांक (melting point) कहते हैं ।

(vi) समाकृतिकता – “अणु प्रायः सुव्यवस्थित होते हैं; अतः बहुत-से ठोस क्रिस्टलीय होते हैं अर्थात् उनकी निश्चित ज्यामितीय आकृति होती है। कुछ ठोसों की कोई आकृति नहीं होती है । ऐसे ठोस अक्रिस्टलीय (amorphous) कहलाते हैं।’ ‘कुछ ठोसों की आकृति एक जैसी होती है । इन ठोसों को समाकृतिक (isomorphous) कहते हैं तथा उनके इस गुण को समाकृतिकता (isomorphism) कहते हैं।”

अणुगति सिद्धान्त ( kinetic theory ) के आधार पर द्रव की व्याख्य

kinetic theory
द्रव के अणु

द्रव अवस्था में अणुओं के मध्य की दूरी ठोस की अपेक्षा कुछ अधिक होती है, जिसके फलस्वरूप संसंजक बल कुछ कम हो जाता है । इसी कारण द्रव के अणु गति करने के लिए स्वतन्त्र रहते हैं । अणुगति सिद्धान्त के आधार पर द्रव के विभिन्न गुणों की व्याख्या निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती है

(i) आकार – द्रवों के अणु गति करते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप इनके स्थान स्थिर नहीं रहते हैं। इसलिए द्रवों के आकार निश्चित नहीं होते हैं।

(ii) आयतन – अणु द्रव की सीमा के अन्दर ही स्वतन्त्रतापूर्वक गति करते रहते हैं, किन्तु वे उसके ऊपरी पृष्ठ को नहीं छोड़ पाते हैं। जब कोई अणु द्रव की ऊपरी सतह पर पहुँचता है, तो द्रव के अन्दर के अणु उसे आकर्षित करते हैं। फलतः अणु द्रव की ऊपरी सतह को भेदकर बाहर नहीं जा पाता है। यही कारण है कि द्रवों का आयतन निश्चित होता है।

(iii) तरलता – द्रव अणुओं की गतिशीलता के कारण ही तरल होते हैं। द्रव की तरलता उसके अणुओं के संसंजक बल पर निर्भर करती है। गाढ़े द्रवों में अणु कम गतिशील तथा तरल द्रवों में अणु अधिक गतिशील होते हैं।

(iv) वाष्पन — “द्रव में उसके अणु विभिन्न वेगों से गतिमान रहते हुए आपस में टकराते रहते हैं; अतः सभी अणुओं की गतिज ऊर्जा एक-सी नहीं होती। कुछ अणुओं की गतिज ऊर्जा इतनी बढ़ जाती है कि वे द्रव के तल को छोड़कर वाष्प में
बदल जाते हैं अणुओं के अधिक गतिमान होने के कारण द्रव से वाष्प अवस्था में बदलने की इस क्रिया को वाष्पन कहते हैं।”

(v) क्वथन – द्रव को गर्म करने पर उसके अणुओं की गतिज ऊर्जा में तीव्रता से वृद्धि होती है । फलतः तेज गति वाले अणु द्रव की सतह को तेजी से छोड़कर वायुमण्डल में आ जाते हैं।
“द्रव को गर्म करते रहने पर एक स्थिति ऐसी आती है, जब वाष्पन की क्रिया न केवल सतह पर बल्कि पूरे द्रव में होने लगती है,बुलबुले उठने लगते हैं तथा द्रव उबलने लगता है। इस स्थिति में द्रव के सभी अणुओं की ऊर्जा इतनी हो जाती है कि वे सभी समूहों के रूप में द्रव की सतह को छोड़कर जाने लगते हैं। इस क्रिया को क्वथन या उबलना (boiling) कहते हैं।” प्रत्येक द्रव में यह क्रिया एक निश्चित ताप पर होती है, जिसे उस द्रव का क्वथनांक (boiling point) कहा जाता है; अतः “किसी द्रव का क्वथनांक वह निश्चित ताप है जिस पर उसका वाष्प दाब,वायुमण्डलीय दाब के बराबर हो जाता है।”

(iv) जमना तथा हिमांक – द्रव को ठण्डा करने पर उसके अणुओं का वेग कम होने लगता है । एक निश्चित ताप पर इस वेग में इतनी कमी आ जाती है कि अन्तरा-अणुक आकर्षण बल गति को नियन्त्रित कर लेता है और अणुओं की स्थितियाँ निश्चित होने लगती हैं। फलस्वरूप अणु अत्यधिक समीप आ जाते हैं तथा अन्तरा-अणुक स्थान कम हो जाता है। यह जमने की प्रक्रिया है तथा द्रव, ठोस अवस्था में परिवर्तित होने लगता है । “किसी द्रव का हिमांक, वह निश्चित ताप है जिस पर उसकी द्रव एवं ठोस अवस्थाओं का वाष्प दाब बराबर हो जाता है।

अणुगति सिद्धान्त ( kinetic theory ) के आधार पर गैस की व्याख्या

kinetic theory
गैस के अणु

गैसीय अवस्था में द्रव्य के अणु बहुत तेजी से गतिमान रहते हैं। इनकी गतिज ऊर्जा बहुत अधिक होती है अणुओं के मध्य आकर्षण-प्रतिकर्षण बलों के प्रायः शून्य होने के कारण स्थितिज ऊर्जा,गतिज ऊर्जा में बदल जाती है तथा अणु प्रत्येक दिशा में स्वतन्त्र रूप में गतिशील रहता है। अणुगति सिद्धान्त के आधार पर गैस अवस्था के गुणों की व्याख्या निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती है

(i) आकार – गैस के अणु गतिशील अवस्था में रहते हैं अर्थात् उनके स्थान स्थिर नहीं होते हैं । इसलिए गैसों के आकार अनिश्चित होते हैं। जिस भी पात्र में गैस भरी जाती है, उसमें पूर्णतया समान रूप से फैल जाती है तथा उसी का आकार धारण कर लेती है।

(ii) आयतन – गैसों के अणु स्वतन्त्रतापूर्वक तीव्र वेग से अनियमित पथ पर सभी सम्भव दिशाओं में निरन्तर गति करते रहते हैं । इसलिए गैसों का आयतन निश्चित नहीं होता है।

(iii) दाब – अणु परस्पर तथा बर्तन की दीवारों से निरन्तर टकराते रहते हैं, जिससे वेग और दिशा में परिवर्तन होता रहता है । बर्तन की दीवारों में अणुओं के निरन्तर टकराने के दौरान अणु बर्तन की दीवारों को संवेग स्थानान्तरित करते हैं और संवेग स्थानान्तरण के फलस्वरूप ही गैस दाब उत्पन्न होता है।

(iv) गतिज ऊर्जा – गैसीय अवस्था में स्थितिज ऊर्जा पूर्णतया गतिज ऊर्जा में बदल जाती है; अत: गैस की गतिज ऊर्जा सर्वाधिक होती है।

(v) द्रवण – गैस पर दाब लगाने एवं उसका ताप कम करने पर अणु पास-पास आते हैं तथा उनकी गति मन्द होती जाती है । इस प्रकार “दाब लगाकर गैस को ठण्डा करने पर वह द्रव में बदल जाती है। गैस के द्रव बनने की इस क्रिया को द्रवण (condensation) कहते हैं।”

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